यह पुस्तक शहरी भारत में तेजी से बढ़ते एकल परिवारों की प्रवृत्ति और उससे जुड़े सामाजिक एकाकीपन का अध्ययन प्रस्तुत करती है। इसमें बताया गया है कि नौकरी, स्थानांतरण, शहरी जीवन की गति, और पड़ोस व रिश्तेदारी के कमजोर होते संबंध किस तरह लोगों के सामाजिक सहारे को कम करते हैं। बुजुर्गों, कामकाजी दंपतियों, और युवाओं के अनुभवों के आधार पर अकेलेपन के मानसिक, सामाजिक, और दैनिक जीवन पर प्रभावों को समझाया गया है। साथ ही, समुदाय आधारित पहल, पड़ोसी नेटवर्क, और सामाजिक सहभागिता बढ़ाने जैसे व्यावहारिक उपायों पर भी चर्चा की गई है।